पुरस्कार वापसी एक नकली प्रयास की भाति लगती है। पुरस्कार वापसी के साथ साथ पुरस्कार राशि क्यों नहीं वापस लौटाते ? सरकार चाहे बीजेपी की हो या कांग्रेस की सब अपने चहेतो को ही पुरस्कार देते आये है।(अंधा बाते रेवड़ी अपने अपनों को देय ) कभी भलमनसाहत में या यु कह दीजिये पुरस्कारों की थोड़ी इज्जत मिल जाती हे। लोग भर्मित हो जाते हे एक दो सही लोगो को पुरस्कार देने से। दूसरे भारत की हर संस्था पर लम्बे समय से इन नकली साम्यवादी और उदारवादी लोगो का कब्जा रहा हे। अब सत्ता परिवर्तन हुआ हे तो दरबारी भी बदलेंगे। समझदार राजा पुराने दलालो और चापलूसों को बनाये रखते हे। मोदी सरकार ये नहीं कर पा रही हे तो इनकी रोजी रोटी का संकट आन खड़ा हुआ हे। देश में चारो और शांति हे बस मीडिया की नजर में ही अराजकता हे। मीडिया वालो को बस चले तो ये लोगो को आपस में लडवा दे. ये तो भारत का आम आदमी हे जिसे किसी से धर्मनिरपेकश्ता या शांति प्रियता सीखने की जरुरत नहीं है क्योकि भारतीय होने का मतलब ही सहिष्णु और अनेकांतवाद में विश्वास रखने वाला होना हे।
10/30/2015
10/07/2014
हैदर - एक समीक्षा
हैदर - एक समीक्षा
1."मेरी मोत का इंतकाम लेना मेरे बच्चे , उसकी उन दो आँखों में गोलिया दागना जिन आँखों से उसने तुम्हारी माँ पर फरेब डाले थे "
२. "हम तब तक आजाद नही होते जब तक की हम अपने इंतकाम से आजाद नही हो जाते।"
1."मेरी मोत का इंतकाम लेना मेरे बच्चे , उसकी उन दो आँखों में गोलिया दागना जिन आँखों से उसने तुम्हारी माँ पर फरेब डाले थे "
२. "हम तब तक आजाद नही होते जब तक की हम अपने इंतकाम से आजाद नही हो जाते।"
10/06/2014
किस और चला जाऊ
किस और चला जाऊ ,
इस और चला जाऊ,
या उस और चला जाऊ।
बहते हे सब धुन में ,
में भी बहता जाऊ
भीड़ जिधर हे स्वीकार उधर।
उस रह अनगिनत ,
चला जाऊ?
या नई कोई रहह में पकडू ?
आशंका में फसता जाऊ
क्या सही गलत कोई जानता ?
या हर कोई भीड़ के साथ ही बहता।
क्या संख्या नरमुंडों का पैमाना हे
सही रह का ?
एक अकेली रह पकड़ जो,
वही पहुंचे हे कही /रवि तक ,
सारी प्रगति और सभ्यता
के नववाहक दूत बने या खेत रहे।
किस और चला जाऊ
मन कहता हे
राह अनूठी
मस्तक बस अपना गणित देखता
समाज जंजीर बनाता
,राह पुरातन पर सत्ताधारी
किस और चला जाऊ?
द्वारा - राकेश जैन
Written by RK JAin
इस और चला जाऊ,
या उस और चला जाऊ।
बहते हे सब धुन में ,
में भी बहता जाऊ
भीड़ जिधर हे स्वीकार उधर।
उस रह अनगिनत ,
चला जाऊ?
या नई कोई रहह में पकडू ?
आशंका में फसता जाऊ
क्या सही गलत कोई जानता ?
या हर कोई भीड़ के साथ ही बहता।
क्या संख्या नरमुंडों का पैमाना हे
सही रह का ?
एक अकेली रह पकड़ जो,
वही पहुंचे हे कही /रवि तक ,
सारी प्रगति और सभ्यता
के नववाहक दूत बने या खेत रहे।
किस और चला जाऊ
मन कहता हे
राह अनूठी
मस्तक बस अपना गणित देखता
समाज जंजीर बनाता
,राह पुरातन पर सत्ताधारी
किस और चला जाऊ?
द्वारा - राकेश जैन
Written by RK JAin
7/13/2014
अंग्रेजी पुल या दीवार ?
यह इस देश की विडंबना है की जिस भाषा को संपर्क सूत्र और ज्ञानार्जन की भाषा के के रूप मे काम करना चाहीये था़ । जिसका सहारा लेकर लोग आगे बढते । उसे बडी ही चतुरता से मैकाले के पुत्रो ने दीवार के रूप मे बदल दीया है। ताकी पीढी दर पीढी इन्ही के वंशज जागीर संभांलते रहे। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सी सैट लागू करना तो इसका एक उदाहरण मात्र है। हालात पहले भी कभी अचछे नही रहे । हा ये जरूर है की ईतनी निर्लज्जता दवारा गैर अंगैजी भाषी/हिन्दी भाषी छात्रों का दमन नही कीया गया़ । ये यूपीऐससी का इतिहास रहा है की जब जब छात्र आंदोलित हुए है उसके अगले वर्ष परिणाम अचछे रहे है। मुझे जहा तक याद हे वर्ष २००४ -२००५ में प्रथम पांच में हिंदी माध्यम के भी दो अभ्यर्थी थे। आम तौर पर प्रथम पंद्रह या पचीस में से एक दो माध्यम के चयनित होते रहे हे। मजेदार बात यह हे की जैसे ही आंदोलन या हिंदी के साथ भेदभाव का हो हल्ला होता हे उसके अगले ह वर्ष फिर प्रथम पचीस में हिंदी माध्यम के कुछ और छात्र जगह बनाते हे।
हमेशा प्रथम पन्द्रह या पचीस में से एक दो स्थान आना संदेह पैदा करता रहा हे। या तो ये माना जाए की आजतक हिंदी माध्यम का कोई भी अभ्यथी प्रथम स्थान पाने लायक मान सिक स्टर का रहा ही नहीं या ये माना जाये की उनके साथ साक्षात्कार में भेदभाव होता हे और उन्हें काम अंक दिए जाते हे। कुछ लोग ये भी मानते हे की मानक पाठ्य सामग्री ( दिलजले -- बाजीराव /श्रीराम / THE हिँदू पढ़े ) के अभाव में हिंदी माध्यम के ज्यादातर अभ्यर्थी चयन के लायक ही नहीं होते। ये तो यू पी ऐस सी उन्हें कृपा करके ले लेती हे। जाहिर हे जिन्हे जो तर्क सूट करेगा वो उसे ही मानेगे / सच क्या हे ये जब तक RTI me उत्तरपुस्तिकाओं की प्रतिया ना मिले नहीं जाना जा सकता।
मेरा मानना हे की समान्य अध्यन में मानक पाठ्य सामग्री का आभाव व साक्षातकार में किसी अंगेरजीदा के बोर्ड में पड जाना ही निर्णायक होता रहा हे। दबे स्वर में ये सवाल भी उठाये जाते हे की ही सामान्य अध्यन्न में उत्तरपुस्तिकाए सामान्यत अंगरेजी भाषी विद्वानही जांचते हे जिनकी हिन्दी बस काम चलाऊ बोल चल लायक होती हे। ऐसे विद्वान हिंदी में गुणवत्तापूर्ण लेखन को नहीं समझा पाते हे और औसत नम्बर देकर परीक्षण की इतिश्री कर लेते हे। अगर ऐसा नहीं होता तो आखिर UPSC को उत्तरपुस्तिकाओं की फोटोकॉपी RTI के तहत देने में हर्ज ही क्या हे। न्याय होना ही नहीं चाहिए न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। इस मामले एक और उदाहरण दर्शनशात्र जैसे विषय का है जिसमे सामान्यत हिंदी माध्यम के छात्र ही 350 से अधिक अंक लाते रहे है। दबे स्वर में लोग मजे लेते हुए कहते हे दर्शनशास्त्र की उतरपुस्तिकाए आम तोर पर राजस्थान या उत्तर प्रदेश के ही विद्वान जांचते हे जिनकी सिर्फ भारतीय अदर्शन पर ही अच्छी पकड़ होती हे। हिन्दीभाषी होते हे जिससे सामान्यत अंग्रजीभाषी छात्र के साथ न्याय हो पाना मुश्किल हो जाता हे। क्योकि समकालीन दर्शन जैसे विषय पर पुरे भारत में २ या ३ अच्छे विद्वान हे बाकि के लिए किसी अंग्रजी माध्यम के छात्र द्वारा लिखे गये गुणवत्ता पूर्ण उत्तर को समझाना मुश्किल हो जाता हे अत वह भी औसत नम्बर के शिकार होते हे। पर हिंदी माध्यम में यह अन्याय जहा सामान्य हे वही अंगरेजी माधयम में यह सिर्फ एक अपवाद हे।
ज्यादातर हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों में से 80 % के आसपास ऐसे होते हे जो जयादातर अंगरेजी की ही पाठ्यसामग्री को अपने अध्यन का आधार बनाते हे। चाहे वो थे हिन्दू पढ़ना हो या EPW या फिर किसी अंग्रजी माध्यम के कोचिंग के नोटस हो। पर समयसीमा में बंधे प्रश्नपत्रों में लिखने के लिए हिंदी या अपनी मातृभाषा (तमिल , तेलगु ,मलयालम ) अपने आपको ज्यादा सहज पाते है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए की अंगरेजी के आलावा अन्य भाषाओ में परीक्षा देने वाले अंग्रजी नहीं जानते। कुछ हिन्दी भाषी अभ्यर्थी अपने आपको तयारी की लम्बी अवधी के दोरना ही पूरी तरह से अंग्रजी माध्यम के समकश जाते है पर फिर भी मुख्या परीक्षा और िनिबन्ध में सहज प्रवाह में किखने हेतु हिंदी माध्यम को बनाये रखते हे जिसका उन्हें नुक्सान भी उठाना पड़ता है। यह तथ्य इस बात से भी पुष्ट होता हे की इंग्लिश अनिवार्य के पेपर में पास होने के लिए अंग्रजी पढ़ने व लिखने की सामान्य से अधिक ही योग्यता चाहिए। अगर हिंदी माध्यम का अभ्यर्थी अंग्रजी की अध्यन सामग्री से पढ़कर दे तो भी इकोनोमिक्स व साइंस एंड टेक्नोलॉजी में नमबर काम ही आते है। में स्वय भी इसका शिकार रहा हु। दो साल तक इन विषयो पढ़ लेने और पेपर अच्छे होने के बावजूद भी नतीजा धक के तीन पात ही रहा।
जब सी सेट लागू हुआ था तभी हम जैसे लोग इसके धुर विरोधी थे क्योकि इसके प्रस्ताव में ही यह निहित था की अबसे प्रीलिम्स आईआईएम, आई आई टी, और इंजनियरिंग और बैंक पी ओ की तैयारी करने वालो की बपोती बनकर रह जाएगा। वो CAT की तैयारी करने के साथ साथ वो जब चाहे प्रीलिम्स देंगे . समय हुआ तो मुख्या परीक्षा देंगे अन्यथा अपने मूल एग्जाम कैट पर ही ध्यान देंगे। एक तरह से आईएएस की परीक्षा में उन लोगो की भरमार होगी जिनका आईएएस प्रथम लक्ष्य कभी नहीं रहा। उनमे भी वही लोग अंत तक रुकेंगे जिनको कैट के द्वारा कोई अच्छा कालेज नहीं मिल जाता। यह सर्वश्रेठ चुनने के बजाये कुछ और की शुरआत थी। बड़ी संख्या में मुखय परीक्षा को छोड़ देने वाले अभ्यर्थियों से यही बात पुष्ट होती हे। ये वैसे ही हे की डाक्टरी की परीक्षा में नाचने और गाने या मॉडलिंग पैरामीटर बना दिया जाये तो लोग डॉक्टर बनेंगे उनमे से आधे ही डॉक्टरी की कठिन पढ़ाई छोड़ भागंगे और बचे खुचे मरीज को बगवान के पास पंहुचा देंगे। ( ऐसे प्रशासक आम जनता को ४००००/- rs की सैलेरी में कहा सुशासन दे पायंगे वो तो १ करोड़ रुपए महीने सैलॅरी वाली नौकरी का खाव्ब संजोये जल्द ही कॉर्पोरेट के सेवक बनगे या आकंठ गंगा में डुबकी लगायंगे )
पिछले दो तीन वर्षो में इसके परिणाम सामने आ गये हे. इस वर्ष अंतिम रूप से सिर्फ 26 अभ्यर्थियों का चयन होना इस निर्लज्जता की पराकाष्ठा हे। अंग्रजी में कार्यसाधक ज्ञान को बढ़ावा देने के बजाये उसे ही अभ्यर्थियों को बहार निकलने का रास्ता बना लेना समझ से पर है।
संघ लोक सेवा आयोग की प्रणाली में वैसे तो और भी गंभीर मुद्दे हे जिनको सुधरने के लिए ही ये बदलाव किए गए थे। पर अब ये साबित हो गया हे की ज्यो ज्यो दवा की मर्ज बढ़ता गया। ये डेल्ही यूनिवर्सिटी ,JNU or अन्य िशवविद्यालये के मानविकी से पढ़ने वाले अंग्रजी भाषी विद्यार्थियों के लिए भी हानिकारक हे। इससे मानविकी विषयो में उपलब्ध सभी अंग्रजी भाषी प्रतिभाये भी हतोत्सहित हुई है। क्योकि सी सेट के बजाये फिर CAT की तैयारी क्यों ना कर जाये।
कुछ और भी बाते अस्पष्ट रूप से पता चली हे जैसे सी सेट में जी के और सी सेट के क़्वालीफआई अंक अलग अलग है। मुख्या परीक्षा में हिंदी में जहा 10 % अंको पर ही पास कर दिया जाता है बही अंग्रजी में 33 % पर वो भी कठिन पेपर देकर। अगर ये मानक वास्तव में ही सत्य हे तो ये तो वैसा ही हे जैसे किसी को कान उमेठकर या पिछवाड़े पर लात मारकर बाहर निकाला जाता है।
तो हिंदी भाषियों को सरकार से सी सेट और आई ए ऐस परीक्षा का अंग्रजी के झुकाव वाला दृश्टिकोण बदलने के बजाय सविधान में लिखित मूल अधिकार लोक नियोजन में अवसर की समानता को मिटाने के लिए कहा जाना चाहिए।
हिंदी माध्यम और अन्य देशी भाषाओ में दी जा रही शिक्षा व विद्यालय पर पूरी तरह से बेन लगा दिया जाना चाहिए। ताकि कल को कोई बेटा या बेटी अपने बाप से ये ना पूछे क्यों आखिर मुझे हिंदी के स्कूल पढ़ाया ?? क्या आपके पास दो जून की रोटी के साथ साथ मुझे इंग्लिश स्कूल में पढ़ाने लायक भी पैसे नहीं थे ? और बेचारा बाप शर्म से आखे जमीन में गड़ाए सोचता रहे की आखिर अंग्रजी को विकास का पुल बनाने का दवा करने वालो ने ना जा ने कोण कोनसे नियम बनाकर उस पल खड़ा करके एक मजबूत दीवार बना दी जिसे वो तो क्या उसकी सात पीढ़िया भी नहीं लाँघ पाएँगी। क्यों नहीं धरती फट जाती और वो उसमे समा जाता ?
लेखक द्वारा व्यक्त विचार पूर्णत निजी हे , लेखक तथ्यों की सत्यता का दावा नहीं करता। अधिकांश तथ्य लेखक के स्वयं तैयारी के दौरान हुए अनुभवों व सुनी सुनाई बातो पर आधारित है। पाठक विवेकानुसार अपनी धारणा बनाये।
4/01/2014
Acid attacks on women
Great news ,today on 1 st April Govt of India passed
A ordinance that acid sells in open market is banned totally.
However it can be used for industrial purposes under strict
Rules and regulation. Finally the deaf and dumb Indian govt
And their high incentive paid babus of India (Gandhi chap paper frame of India)
understands the logic behind restrictions on sell of acid in open market.As
Toilets can be cleaned by simple washing powder or by harpic type products .
(Jiddi dag me he kitanu).Finally the patriarchal structure of power understands that a women's life Is more precious than the so called cleaning of toilets .It is a rumour in corridors that a illegal daughter of a very high profile leader of national politics were became a victim of acid attack.
Than the govt finally take the decision one step ahed from supreme court decision (prohibition).
Which converts now from prohibition and restrictions to a total ban.it is also felt
In media that govt want to impress the 50%voters of India called Aadhi Aabadi (women)
Irony of our time that it is only a news for 1 st April .How helpless we are?
The problem can be resolved(80%) by a simple ordinance of govt of India.
But nobody has time to think or put forward a proposal and make them agree about need of a ordinance .As the person who can think or wand todo something good is seen everywhere in corners Or out side from so called steel frame (now it is paper frame)of India .
Don't be Serious it's only a April fool news. As we the people of India can laugh on
ourselves To remain positive as usual .
3/31/2014
1%of total revenue will be granted as reward to division and ranges
Today
I heard a very good news.
Our FM approved the reward policy for
CBDT&CBEC officials and employees
Upto the rank of inspector.
Policy prescribes that a sum of 1% of total revenue
Collected by field formations ( as commissionerate,divisions
And ranges), will be granted as reward to the officers working
in respective ranges and division as per their revenue collection.
The brode rules for distribution of rewards Will be published soon.
It was felt that it encourages the officers to collect more revenue
And abolish the curreption .however I guess it is a populist policy
For election to attract the votes of lacs of employees working under
CBDT And CBEC. Further it is not sure that the next govt will agree
To continue or implement this reward policy.however in my opinion
This is the right step in the era of globalisation .ultimately how a
person can be responsible for collection of 300 -400 crores of
revenue With the salary of 50000 with no rewards for his/her efferts .
Created by Rakesh Jain on 1 st April 2014😀
Have fun.
3/17/2014
होली
होली का त्योहार ,
हर्ष हो अपार।
रंगों की बौछार ,
जीवन हो ख़ुशियों से सरोबार ।
पल पल रंग बदलें ख़ुशियाँ ,
जीवन ना हो कभी उदास।
सतरंगी इंदधनूष सा जीवन हो,
सामंजस्य ,सोहाद् से हो सरोबार ।
छँटा इदधनूषी रंगों की ,
बिखरे आप के घर द्वार ।
राकेश जैन।
1/24/2014
धूम -3 --Dhoom-3
धूम -3 एक बड़ी हि सामान्य सी फ़िल्म लगी। आमिर खान अपनी फिल्मो के चयन और जी जान से जुटकर मेहनत करने के लिए जाने जाते है, लेकिन इस फ़िल्म को देखकर निराशा सी हुई। फ़िल्म में काफी पैसा लगाया हे और मेहनत भी कि गई हे। लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म कि स्टोरी में ही जान नहीं थी। इस जमाने में किसी एक बेंक के पीछे पद जाना वो भी सिर्फ इस वजह से कुछ जमा नहीं। जैसा कि आजकल का सामान्य पढ़ा लिखा अपराधी भी यह जानता हे कि इस तरह केअमानवीय व्यहार के पीछे घृणित-पूंजीवाद (crony capitalism ) ही है और वह किसी एक व्यक्ति या बैंकर को मारने या बैंक लूटने से ख़तम नहीं होगी।
बेहतर होता मूवी को सुब प्राइम मार्गेज से उपजे संकटो से जोड़ा जाता और नायक या खलनायक उसके दष्प्रभावो को सामने लाते हुए बेबस मानवीयता को सामने रखता। आखिर 500 करोड़ रुपये कमाने वाली मूवी से इतनी उम्मीद तो कि ही जा सकती हे।
फ़िल्म कि शुरुआत बहुत ही ख़राब है। अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा के ऑटो वाले दृश्य ऐसा लगते हे कि जेसे कोई घटिया साउथ इंडियन हिंसक मूवी देख रहे हो।अभिषेक के चेहरे पर कोई भाव नहीं आते है और उदय चोपड़ा के पुराने जोक्स इरिटेट करते है। अगला सीक्वल बनाते समय आदित्य चपड़ा इनसे निजात पा ले तो बेहतर होगा। बैंक रोबरी पर ज्यादा अच्छी प्लानिंग और फिल्मांकन के साथ हम डॉन-3 ,रेस -2 देख चुके है। फर्स्ट हाफ में फ़िल्म बहुत झिलाऊ है। सेकंड हाफ में दोनों भाईयो कि tuning से ही स्टोरी जमती हे। बाइक रेस के दृश्य अच्छे है और फ़िल्म की जान भी है। हालाकि मेट्रो ट्रैन को मोटे तार पर क्रॉस करते समय कोई भी बाइकर पर गोली नहीं चलाता यह समझ से परे है। ऐसे दृश्य सलमान खान टाइप फिल्मो दबंग ,सिंघम आदी में ही अच्छे लगते हे।
ध्यान से देखा जाये तो आमिर खान कि पिछली २-३ फिल्मो में तलाश ,धोबीघाट जेसी फिल्मे हे जो कि उतनी सफल नहीं हुई। हलाकि फ़िल्म समीक्षा कि दृष्टि धोबीघाट एक बेहतर फ़िल्म थी लकिन व्यसाय अच्छा नहीं कर पाई क्योकि वो एक साहित्यिक उपन्यास कि तरह लगती थी। थ्री इडियट्स हर मामले में बेहतरीन फ़िल्म थी। फ़िल्म में कामेडी पर किया गया काम और स्टोरी ही फ़िल्म कि जान थी। आने वाली फ़िल्म पी. के से भी यही उम्मीदे है । अंतर दरअसल दो विलक्षण प्रतिभाओ के साथ मिलकर काम करने का हे। आमिर अच्छा अभिनय कर सकते है पर स्टोरी में जान डालना और उसे कॉमेडी से भरपूर मनोरंजक बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसमे राजकुमार हीरानी को महारत हासिल है। उनकी पिछली फिल्मो को एक वाक्य में कहा जाये तो ----उनकी फिल्मे ऐसी हे जिहे देखते समय होंटो पर हंसी रहती है और आँखों में नमी रहती हे। आज इस दौर में अमोल पालेकर और राजकपूर जेसे निर्देशको कि कमी खलती है। हीरानी और अनुराग कश्यप को छोड़कर कोई आसपास भी नहीं हे।
हालाकि बर्फी ,विकी डोनर , फुकरे , जब वी मेट ,वेक अप सीड जेसी फिल्मो के निर्देशक उम्मीदे जगाते है। इस साल 2013 कि सबसे अच्छी फिल्मो में मुझे 1. बर्फी 2.ये जवानी हे दीवानी 3. चैनई एक्सप्रेस 4. ओ माई गोड लगी और धूम -3 उनमे एक औसत देख भर लेने लायक फ़िल्म लगी।
बेहतर होता मूवी को सुब प्राइम मार्गेज से उपजे संकटो से जोड़ा जाता और नायक या खलनायक उसके दष्प्रभावो को सामने लाते हुए बेबस मानवीयता को सामने रखता। आखिर 500 करोड़ रुपये कमाने वाली मूवी से इतनी उम्मीद तो कि ही जा सकती हे।
फ़िल्म कि शुरुआत बहुत ही ख़राब है। अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा के ऑटो वाले दृश्य ऐसा लगते हे कि जेसे कोई घटिया साउथ इंडियन हिंसक मूवी देख रहे हो।अभिषेक के चेहरे पर कोई भाव नहीं आते है और उदय चोपड़ा के पुराने जोक्स इरिटेट करते है। अगला सीक्वल बनाते समय आदित्य चपड़ा इनसे निजात पा ले तो बेहतर होगा। बैंक रोबरी पर ज्यादा अच्छी प्लानिंग और फिल्मांकन के साथ हम डॉन-3 ,रेस -2 देख चुके है। फर्स्ट हाफ में फ़िल्म बहुत झिलाऊ है। सेकंड हाफ में दोनों भाईयो कि tuning से ही स्टोरी जमती हे। बाइक रेस के दृश्य अच्छे है और फ़िल्म की जान भी है। हालाकि मेट्रो ट्रैन को मोटे तार पर क्रॉस करते समय कोई भी बाइकर पर गोली नहीं चलाता यह समझ से परे है। ऐसे दृश्य सलमान खान टाइप फिल्मो दबंग ,सिंघम आदी में ही अच्छे लगते हे।
ध्यान से देखा जाये तो आमिर खान कि पिछली २-३ फिल्मो में तलाश ,धोबीघाट जेसी फिल्मे हे जो कि उतनी सफल नहीं हुई। हलाकि फ़िल्म समीक्षा कि दृष्टि धोबीघाट एक बेहतर फ़िल्म थी लकिन व्यसाय अच्छा नहीं कर पाई क्योकि वो एक साहित्यिक उपन्यास कि तरह लगती थी। थ्री इडियट्स हर मामले में बेहतरीन फ़िल्म थी। फ़िल्म में कामेडी पर किया गया काम और स्टोरी ही फ़िल्म कि जान थी। आने वाली फ़िल्म पी. के से भी यही उम्मीदे है । अंतर दरअसल दो विलक्षण प्रतिभाओ के साथ मिलकर काम करने का हे। आमिर अच्छा अभिनय कर सकते है पर स्टोरी में जान डालना और उसे कॉमेडी से भरपूर मनोरंजक बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसमे राजकुमार हीरानी को महारत हासिल है। उनकी पिछली फिल्मो को एक वाक्य में कहा जाये तो ----उनकी फिल्मे ऐसी हे जिहे देखते समय होंटो पर हंसी रहती है और आँखों में नमी रहती हे। आज इस दौर में अमोल पालेकर और राजकपूर जेसे निर्देशको कि कमी खलती है। हीरानी और अनुराग कश्यप को छोड़कर कोई आसपास भी नहीं हे।
हालाकि बर्फी ,विकी डोनर , फुकरे , जब वी मेट ,वेक अप सीड जेसी फिल्मो के निर्देशक उम्मीदे जगाते है। इस साल 2013 कि सबसे अच्छी फिल्मो में मुझे 1. बर्फी 2.ये जवानी हे दीवानी 3. चैनई एक्सप्रेस 4. ओ माई गोड लगी और धूम -3 उनमे एक औसत देख भर लेने लायक फ़िल्म लगी।
अब मुझे लगता हे कि वो समय आ गया हे कि भारतीय निर्माता निर्देशक वैश्विक व्यवसाय करने वाली फिल्मो का निर्माण करे। क्योकि वैश्विक फिल्मे भी भारत में अच्छा कारोबार कर रही हे। लकिन उसके लिए हमें कुछ गिनी चुनी प्रतिभाओ और दोस्तों के कुनबे से बहार निकलकर शुद्ध व्यवसायिक या कलाकार कि दृष्टी से फिल्मो का निर्माण करना पडेगा। तब शायद 1000 करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।
12/08/2011
डर्टी पिक्चर- Dirty picture-
एक अच्छी मूवी हे .एक नवोदित तरीका के संघर्ष के दिनों से लेकर सफलता को न पचा पाने और अपने इगो और दिल की कशमकश में अपनी जिंदगी को हर जाने की कहानी हे. जिन सस्ते तरीको का सहारा लेकर फिल्म उद्योग में तरीका ने सफलता पाई थी, वह खुद भी उन्ही तरीको की शिकार बन गई. सफलता पाने के लिए एक शादीशुदा आदमी से प्यार करना फिर उसके प्यार में ही दिल टूट जाना, अपने आप में गहरा विरोधाभास हे.पर निर्देशक ने जिंदगी की हकीकत को परदे पर रखा हे --की हम भले ही कितनी भी झूठ और बेमानी का सहारा ले, कितने ही गलत तोर तरीके अपनाये, पर अपने प्रति हम भी ईमानदारी और भलाई का ही ट्रीटमेंट चाहते हे. हलाकि नायिका का अंत में उसे चाहने वाला निर्देशक मोजूद होने पर भी आत्महत्या कर लेना गले से नीचे नहीं उतरता .पर असल जिनगी में भी जब लोग अपने भीतर से टूटते हे तो वो निराशा और हताशा में सामने दिख रहे उज्जवल भविष्य को भी अँधेरे का ही एक रूप मानकर अपने आप से किसी भी सकारातमक बदलाव के लिए इंकार कर देते हे.नायिका को अपनी माँ द्वारा अस्वीकार किया जाना, उसके बारे में उलटी सीढ़ी बाते पात्र पत्रिकाओ में छापना, उसके खुद के मन में अपनी नकरातमक छवि का निर्माण करता हे, जिसे हटाने के लिए वो अक्सर उसे छुपाने के बजाये पूरी बोल्डनेस के साथ अपने बिंदास संवादों में उन्हें स्वीकार भी करती हे --"एसी लड़कीया घर ले जाने के लायक नहीं पर बिस्तर में ले जाने के लायक होती हे." और अंत में अपनी इस छवि के लिए कही न कही खुद को ही दोषी मानकर खुद को सजा देने का निर्णय नायिका अपने मन में कर चुकी होती हे .संवाद अदायगी बेजोड़ हे . एक स्थान पर जब निर्देशक उससे कहटा हे की --"तुम पैदा ही क्यों हुई तो नायिका का जवाब की लोग हमें देखना चाहते हे इसलिए में नहीं कोई और सही पर हमारे जेसी लडकिया पैदा होती रहेगी .मूवी में नायला का किरदार बहुत खूबी से रचा गया हे जो नायिका द्वरा कही उनकाही बातो की पूर्ति करता हे .कुल मिलकर किसी भी सस्ती मूवी की अपेक्षा निर्माता निर्देशकों ने अश्लीलता से बचते हुए एक अच्छी कहानी को अच्छी ढंग से पिरोया हे. पूरी मूवी किसी साहित्यिक करती की तरह लगती हे . हालाकि नसीरूदीन शाह का अभिनय हमेशा से एक मील का पत्थर रहा हे पर इसमें उनके लायक कोई काम ही नहीं था उनका किरदारबोझिल हे और बोरियत पैदा करता हे वेसे भी ६० के नसीरूदीन की जोड़ी हीरो के रूप में बिलकुल नहीं जम रही वो कुछ ज्यादा बुड्डे लग रहे हे .ये पूरी तरह से नायिका प्रधान फिल्म हे जिसमे सरे किरदार सिर्फ नायिका की कहानी कहते हे जो कुछ वो अपने मुह से नहीं कह पाती .फिल्म के बहाने ग्लेमर, सफलता, हताशा जेसे विषयो पर भी प्रकाश पड़ता हे .प्रीटी जिंटा ने भी एक बार कहा था की कैमरे की चमक की आदत पड़ जाने के बाद उससे दूर हो जाना हर कोई नहीं झेल पाता.चमक के पीछे हमेशा एक घुप्प अँधेरा होता हे, जिसका सामना करने के लिए हमें तयार रहना चाहिए . क्योकि चमक तो अस्थायी हे इसीलिए वो सूरज की रौशनी में अपना कमल नहीं दिखा पाती , उसके लिये प्र्स्तभूमि में गहरा अँधेरा होना जरुरी हे .पर अपने ज़माने में उचाई और शोहरत की बुलंदियों पर पहुचे लोग इसे पचा नहीं पाते और बाकि जीवन अवसाद की कहानी बनकर रह जाता हे .
11/10/2011
4/18/2011
अहमदाबाद
अहमदाबाद में ट्रेफिक रूल्स देखने को नहीं मिले.चोराहो पर लोग मनमर्जी से गाड़िया निकलते हे और ट्रेफ्फिक जम होता रहता हे.में शिकयत नहीं कर रहा हु.यहाँ पर इतना ट्रेफ्फिक नहीं हे पर फिर भी एक इन्दोर जबलपुर जयपुर जेसे बड़े शर के बराबर व उनसे बड़े शहर में लचर ट्रेफ्फिक व्यस्था का होना गले नहीं उतारा.
3/10/2011
में भी बम फोड़ दू मेरे साथ अन्याय हो रहा हे
बम फ़ोड्ने से निर्दोशो को मारने से क्या किसी समस्या का समाधान हो जायेगा.अन्याय ओर शोशण कोन नही कर रहा हे .पर खुद के द्वारा किया गया अन्याय नजर नही आता. आतन्क्वादी अन्याय के खिलाफ़ नही लड रहे वो तो पुरी दुनिया को अपने हिसाब से बद्लना चाहते हे .ओसामा ने ये स्पस्ट कहा हे कि वो पुरी दुनिया मे खुदा क राज चाहता हे .बाकि जगह भी लोग शरीयत को लागु करने पर अड जाते हे . ये वही लोग हे जो हर जगह पाये जाते हे --फ़न्डांमे्न्ट्लीस्ट-या आमुल प्रमाणवादी .चाहे वो केथोलिक हो चाहे कट्टर यहुदी या हिन्दु धर्म को मुस्लिम धर्म की तरह मिलिटॆन्ट धर्म बना देने वाले समुह . अन्तर इतना हे कि हिन्सा को वेधता कही भी प्राप्त नही हे सिवाय मार्क्स्वादियो,फासीवादियो और सामी धर्मो के .इनके समर्थक जेहाद कि अवधारना कुरान मे पाये जाने का तो विरोध करते हे पर ये नही बताते कि कहा अन्य धर्मो के समान दया करुणा ओर परोपकार की बाते लिखी हुए हे . सम्स्या यही हे हिन्सा की वेधता ओर अन्तिम सत्य को जानने का दावा जो किसी भी तरह के तर्क वितर्क ओर बहस को अस्वीकार करता हे .सत्य हमेशा मानवीय द्र्श्टीकोन पर निर्भर करता हे .इसीलिये महावीर स्वामी को पेड -पोधो मे जीवन नही दिखाई दिया ओर उन्होने इसे शाकाहार माना . तब तक इन्मे जीवन प्रमाणित नही हुआ था.बुद्ध बीवी को त्यागकर सन्यासी हो गये और किसी ने उन पर बीवी बच्चो को बेसहारा करने का आरोप भी नहीं लगाया .ओर मुस्लिमो तथा इसाइयो को मान्साहार मे कुछ अन्याय नजर नही आता खुद पर अन्याय की दुहाई देते समय . जेसे निर्दोशो को मारने का लाइसेन्स इनके पास हे .जेसे अमेरीका के पास हे जापान मे परमाणु बम फ़ोडने का ओर इराक पर कब्जा जमा लेने का .अन्तिम सत्य को जानने का दावा करने वाला कोइ भी आदमी जाने या अन्जाने मे मानवता के प्रति अपराधी हे चाहे वो कोई भी हो . . अब आगे लिखते हुए मेरी भी फ़ट रही हे कही मुझे भी बम से उडा दे तो . सबसे सेफ़ तो गान्धीजी ओर महावीर स्वामी की आलोचना हे क्योकि ये अहिंसा को मानते हे और इनके अनुयायी अगर आलोचना करने पर हिंसक विरोध करते हे तो खुद ही गलत हे . पर सबकी भावनाये आहत होते देख उन्की भी भाव्नाये आहत हो सकती हे . हो सकता हे इनको लगे की हमारे साथ अन्याय हो रहा हे .अहिन्सा को कोइ मान हि नही रहा तो ये भी बम फ़ोड दे. तस्लीमा का हश्र तो देख ही रहे हे ना.दरअसल सही और गलत की पहचान करना इतना आसान नहीं हे. हर कोई गांधीजी की तरह नहीं हो सकता जिन्होंने अंग्रेजो का विरोध करते हुए भी जापान और जर्मनी जेसी फासीवादी ताकतों की सही पहचान करते हुए उनका सहयोग लेना गवारा नहीं समझा.कही ना कही कम या ज्यादा अर्थो में हम किसी न किसी रूप में कुछ गलत चीजो या अन्याय का हिस्सा होते हे और किसी न किसी रूप में पीड़ित भी होते हे. दूसरो को बदलना हमारे बस में नहीं हे पर जहा कही भी हम गलत चीजो का हिस्स्सा बनने से अपने आपको बचा सके,यही जरुरी हे.वो चाहे पुरुष के रूप में स्त्रियों के पर्ती यवहार हो, बड़ो के रूप में बच्चो के प्रति.बच्चो के रूप में बड़ो के प्रति, मालिक के रूप में नोकरो के प्रति चाहे जिस रूप में पर यही एक आसन तरीका हे जिसे बिना किसी को बदले खुद के प्रति थोडा सा अवेयर होते हुई पालन किया जा सकता हे और ईश्वर की बनायी हुई इस खुबसूरत दुनिया को और बेहतर बनाया जा सकता हे. ( ये एक साल भर पुरानी पोस्ट थी जिसे थोडा सा एडिट करके आज मेने वापस पोस्ट किया हे)
1/24/2011
हसना -रोना
कुछ लोग रोते हुए आते हे दूसरो को रुलाते हे और रोते हुए ही चले जाते हे जबकि कुछ लोग रोते हुई आते हे और हसते हुए चले जाते हे जिनके जाने के बाद दुनिया रोती हे .
smile
कुछ लोग रोते हुए आते हे दूसरो को भी रुलाते हे और रोते हुए ही चले जाते हे . कुछ लोग रोते हुए आते हे पर जिंदगी भर दूसरो को हसाते हे और हसते हुए ही चले जाते हे जिनके जाने के बाद दुनिया रोती.
धोबीघाट -समीक्षा
समीक्षा धोबीघाट अच्छी मूवी हें या बुरी इस बारे मे निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता.पर मुख्या धारा के मनोरंजन प्रेमी दर्शको को ये निराश अवश्य करती हें. मूवी एक आर्ट मूवी की तरह शुरू होती हें.दर्शको की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करती हें और अंत मे उसे साहित्य की कल्पनापरक गलियों के अंत की तरह धुखांत- सुखांत के भवर मे डालकर समाप्त हो जाती हें.आमिर खान की छवि व्यावसायिक सिनेमा मे आर्ट एलिमेंट वाली मुविस की बनी हुई हें जो मनोरंजन करने के साथ साथ दिल को भी कही छुटी हें.ऐसे मनोरंजन और मूवी की अपेक्षा रखने वाले दर्शको को इससे निराशा ही हाथ लगेगी.खेर जो भी हें मूवी ठीक हें पर आर्ट की द्रष्टि से भी इसे कोई बहुत अच्छी मूवी नहीं कहा जा सकता.रेनकोट,लाइफ इन अ मेट्रो.जेसी मुविस के आस पास भी नहीं हें. कभी कभी लगता हें की मूवी मधुर भंडारकर की फिल्मो की तरह सत्य का शाक्षात्कार करते हुई चलती हें.कभी वृत्त चित्र के सामान लेकिन उस द्रष्टि से भी उतनी गहराई नहीं हें . एक द्रश्य जरुर अन्दर तक झकझोर देता हें. जब तीन विडिओ केसेट देखते हुए आमिर उसके तार्किक अंत की कल्पना करता हें तब नायक और मूवी की के द्रश्य मे पसरी हुई असहायता हमें अन्दर तक झकझोर देती हें. एक पल के लिए तो एसा लगता हें की नायक अब सब कुछ छोड़कर उस नायिका की जीवन सुधरने का बीड़ा उठा लेगा पर अगले ही पल फासी के द्रश्य की कल्पना मन को गहरे अवसाद गुस्से और असहायता के भवर मे ले जाती हें.फिल्म मे प्रतीक रूप से बेजान इमारतो या घरो से जुडी हुई लोगो की जिन्दगी को दिखाया गया हें.हर घर या इमारत के बदलने से जिन्दगी किस तरह से बदल जाती हे.बेजान पत्रों में भवनाओं का खाधा मिलने से ही वह घर बनता हे.जिसे छोड़कर जाना गहरे अलगाव को पैदा करता हे.हालाकि आमिर को भी अंत में घर बदलने के सिवा कुछ और नहीं सूझता.ये बात जरुर हे की आम फिल्मो की तरह निर्देशक ने तलक शुदा नायक के अवसादग्रस्त स्थिथि का कारण उसकी पत्नी को बताने से बचा गया हे जो काबिलेतारीफ हे .दूसरी और द्वंद मे पड़ी नायिका जो पेंटर को प्यार करती हें पर धोबी से मिल रहे भावनाओ के कोमल स्पर्श को भी नहीं छोड़ना चाहती.अंत मे उसके द्वरा पेंटर का पता देने और अपने दोस्त की हत्या से उपजे सच को स्वीकार कर नायिका के द्वंद को जानकार अपने मनोरम कल्पनाओं को विराम देने की कहानिया ह्र्दयास्पर्शी जरुर हें. पर त्री इडियट जेसी हास्य--उदेश्यपरक फिल्म की अपेक्षा लिए फिल्म देखने गए सामान्य दर्शको का इससे संतुष्ट हो पाना संभव नहीं हें . मजाक मे लोग ये भी कह रहे हें. संजय लीला भंसाली के बाद शायद आमिर मे आस्कर के मोह मे पड गए लगते हें . खेर जो भी हो ये धारणा तो टूट ही गयी हें की आमिर की मूवी हें तो अच्छी ही होगी.by राकेश जैन
10/14/2010
हिंसा की पवित्रता
हिंसा की पवित्रता -- हिंसा के प्रति अनुराग सभी समाजो मे पाया जाता हें लकिन कुछ समाजो मे ये जयादा पाया हें .खासकर के ESE समाजों मे सत्य की एक्वादी अवधारणा पायी जाती हें.इसीलिए हिंसा के पार्टी मोह एसा समाजो मे ज्यादा पाया जाता हें.चीजो को सिर्फ सही और गलत नजरिये से देखना ठीक नहीं हें . सही और गलत के आलावा और भी bahut से दर्श्तिकोना हो सकते हें.सत्य की एक्वादी अवधारणा मे एक तरह की एक्स्क्लुसिव्नेस आ जाती हें जो अपने आपको सही और दूसरो को गलत मानती हें. यह किसी भी धर्म संस्कर्ति विचारधारा मे हो सकता हें .सभी सामी धर्म (मुस्लिम,इसाई,यहूदी) मे तो यह अवधारणा पायी हि जाती हें . पहले मे यह समझता था की हिन्दू धर्म मे हिंसा का प्रावधान नहीं हें पर बाद मे मेने अमर्त्य सेन के जस्टिस मे महाभारत मे हिसा पर्तिहिंसा की प्रासंगिकता के बारे मे तर्क पढ़े तो गीता का मुख्या उपदेश यही लगा किहिंसा के बदले पर्तिहिंसा करना उचित हें. आधुनिकताकी अवधारणा ने भी यही किया की manushayaa ke sahi or galat me sochne ki parvarti ko or pukhataa kar diya . sampradaayikataa or धार्मिक संघर्षो पर अध्ययन करने वालो ने ये बताया हें की इस तरह की एक्स्क्लुसिव्नेस आधुनिकता के बाद हि धर्मो मे आई .हिंशा को उचित ठहराते समय हम अकसर अपने सही होने का तर्क देते हें और पर्तिहिंसा को उचित टहराते हें .
10/11/2010
आद्शवाद
मेरी समझ मे आदर्शवाद से ज्यादा खतरनाक कोइचीज नहीं हें।आद्शवाद सत्य
की अवधारणा पर टिका हुआ है।
10/05/2010
9/11/2010
नक्सलवाद
नक्सलवाद केवल सामाजिक आर्थिक समस्या हि नहीं हें इसके अलावा भी नहुत कुछ हें.विचारधारा की भी इसमें प्रमुख भूमिका हें.मरी हुई विचारधाराए अभी भी की लोगो को सभी समस्याओं से मुक्त राम राज्य का सपना दिखाती हें जिनकी अप्रासिंगकता जगजाहिर हें.क्रान्ति की अव्यहार्यता व्यहार और सिदांत दोनों मे सिद्द हो चुकी हें.हामारे सारे सामाजिक -राजनितिक सिद्धांतो की सीमा मानव स्वभाव की कमजोरिया हें। इंसान अछाई और बुराई दोनों का मिश्रण हें । इसलिए इन्हें कम तो किया जा सकता हें पर मिटाया नहीं जा सकता.
8/01/2010
Movie..khatta-meetha
Its a nice movie.comady romance n story is also there.i said good in the sence of time pass nothing else.some of my friends they dind like the movie y i dont know.
6/09/2010
खुशखबरी
हिंदी ब्लॉगर समुदाय को ये सूचित करते हुए मुझे हार्दिक पर्संनता हो रही हे की इस वर्ष मेरा चयन आई ऐ एस परीक्षा में ४०५ वी रेंक पर हो गया हे । संभवत आई आर एस मिल जाएगा .आप सभी ब्लागर्स का ज्ञान संवर्धन और मुद्दों पर समझ के लिए आभारी हू.
4/21/2010
उत्तरपुस्तिकाए दिखाना
मुझे आज तक समझा मे नहीं आया की भारतीय शिक्षा संस्थाओ और लोक सेवा आयोगों को परिक्षर्तियो को उनकी कापी की नक़ल देने मे क्या दिक्कत हें । कुछ पेसे लेकर नकल या ज़ेरोक्स देने से तो brshtaachar ही रुकेगा । एसा लगता हें जेसे उत्तर्पुस्तिकू की नक़ल दे देने से रास्त्र की एकता और अखंडता खतरे मे पद जाएगी .बहुत से लोग आतम हत्या या डिप्रेसन के शिकार हो जाते हें क्योकि वो कभी समझ ही नहीं पते की उनके घटिया नम्बरों का कारण क्या हें .सिब्बल साहब को इस पर भी जोर देना चाहिए। --एक बहुत अछे कोटेशन मे इसे खा जा सकता हें ---की भारत मे हमने पर्तिस्प्रधामुल्क समाज का मानक तो अपना लिया हें पर उनमे पर्दर्शन को मापने वाली संस्थाओ की गुणवत्ता बहुत ही घटिया हें .इसे एसा कहा जा सकता हें की दोद मे जीत का निर्णय करने वाले रेफरी की घडी ही १० मिनट आगे पीछे हें । जहा हार जीत सेकंडो सी तय होती हें .
शादी-प्यार
एक बार कही अचा सा कोटेशन पढ़ा था--प्यार मे आदमी गुलाम हो जाता हें और शादी मे गुलाम बनाने की कोशिश करता हें .
कोई खास nahi
Koi tumse puche kaun hun mein
To kehdena koi khas nahin
Ek dost hai kacha pakka sa
Jajbaat pe dhare ek parda sa
Dil ka aisa saathi hai
Jo durr rehke paas bhi hai
Koi tumse puche kaun hun mein
To kehdena "KOI KHAS NAHIN
To kehdena koi khas nahin
Ek dost hai kacha pakka sa
Jajbaat pe dhare ek parda sa
Dil ka aisa saathi hai
Jo durr rehke paas bhi hai
Koi tumse puche kaun hun mein
To kehdena "KOI KHAS NAHIN
3/06/2010
life
Once i asked on yahoo answers a interesting question what is life ?there are many reply but one is very precious . A Brazilian lady said - life is game of choice and decision .Many things are important in life like luck,god,parenting,conditions .People believe in these things .But i realise -- many factors n conditions controls our life . We believe in god n luck but no one know about the objectivity of such things. We just believe in these things because we can not know the reason behind the events . In this situation i also believe in this quote--LIFE IS GAME OF CHOICE AND DECISIONS
11/21/2009
दो नावो की सवारी
किसी ने सही कहा हे की एक साथ कई सारे काम नही कराने चाहिए। वरना किसी भी काम मे हम अपना पुरा समपर्ण नही दे पाते और काम बिगड़ जाते हे या उनमे एक प्रकार की कामचलाऊ पण आ जाता हे । .काफी दिन हो गए लिखे हुई सोचा कुछ तो लिखता हु.
9/26/2009
दर्शनशास्त्र
आम तोर पर लोग जहा से सोचना बंद करते हें दर्शनशास्त्र मे लोग वहा से सोचना शुरू करते हें । अगर किसी को अपने ज्ञान पर कुछ ज्यादा ही घमंड हें और उसने दर्शन कभी पढ़ा नही तो ये जायज नही होगा । सुकरात ने कहा भी हें की जो अपने अज्ञान की सीमाओं को जानता हें वही ज्ञानी हें । यानि जो gayn की अज्ञानता को जानता हें.लादेन भी एक एन्ज्नीयर था .अधिकांश इसे लोग जो कट्टरवादी मान्यताओ से गर्स्त होते हें वो की बार उच्छ शिक्षित होते हें पर ,मानविकी मे नही बल्कि वैज्ञानिक विषयों मे । जिनमे निश्चित ज्ञान का दावा किया जाता हें । जबकि सामाजिक विषयों मे अध्ययन द्वंदात्मक होता हें .इसलिए इसे लोगो के कतार्पंथी बनने की संभावना कम होती हें.
आतंकवाद एक टेक्निक
कुछ विद्वान आतंकवाद को भी अन्याय से लड़ने की तकनीक मानते हे .मेरा मत हे की एसा कुछ ही मामलों मे सही हो सकता हे .जिन्हें पीड़ित रास्तीयाताये मानकर हिंसा को उचित ठहराया जा सकता हे। पर अल कायदा आतंकवाद -मुस्लिम विश्वव्यापी आतंकवाद को नही । क्योकि उनके पास किसी just सोसाइटी का विचार नही हे.वो तो अपनी कट्टर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर शरीयत जेसा देवीय शाषन चहाते हें। uसकी व्याख्या का अधिकार भी उनके पास ही हें .ख़ुद पर शासन करने के अन्य लोगो के अधिकार को भी वे नही मानते .उन्हें अपने अनेतिक कार्यो के लिए अमेरिका की भाति किसी wmd वेपन जेसे मुखोटे की भी जरुरत नही हें । स्पस्ट हें की आतंकवाद का यह रूप ही विश्वशांति के लिए खतरा हें न की अन्य स्थानीय पक्र्ती के आन्दोलन .और इसे किसी भी आधार पर justify नही किया जा सकता .इसे उचित ठहराना इसमे व अन्य जायज हिसात्मक आंदोलनों मे फर्क न कर पाने के कारण हें । मार्क्सवादी चश्मे से तो ख़ुद को मारने आया किक्लर भी सामाजिक परिस्थीथीका उत्पाद नजर आता हें .
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