10/06/2014

किस और चला जाऊ

किस और चला जाऊ ,
इस और चला जाऊ,
या उस और चला जाऊ। 
बहते हे सब धुन में ,
में भी बहता  जाऊ
भीड़ जिधर हे स्वीकार उधर
उस रह अनगिनत ,
चला जाऊ?
या नई कोई रहह में पकडू ?
आशंका में फसता जाऊ  
क्या सही गलत कोई जानता ?
या हर कोई भीड़ के साथ ही बहता
क्या संख्या नरमुंडों का पैमाना हे
सही रह का ?
एक अकेली रह पकड़ जो,
वही  पहुंचे हे कही /रवि तक ,
सारी  प्रगति और सभ्यता
के नववाहक दूत बने या खेत रहे। 
किस और चला जाऊ
मन कहता हे

 राह  अनूठी
मस्तक बस अपना  गणित देखता
समाज  जंजीर बनाता

,राह पुरातन पर सत्ताधारी
किस और चला जाऊ?


द्वारा - राकेश जैन 

Written by RK JAin

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