अहमदाबाद में ट्रेफिक रूल्स देखने को नहीं मिले.चोराहो पर लोग मनमर्जी से गाड़िया निकलते हे और ट्रेफ्फिक जम होता रहता हे.में शिकयत नहीं कर रहा हु.यहाँ पर इतना ट्रेफ्फिक नहीं हे पर फिर भी एक इन्दोर जबलपुर जयपुर जेसे बड़े शर के बराबर व उनसे बड़े शहर में लचर ट्रेफ्फिक व्यस्था का होना गले नहीं उतारा.
बम फ़ोड्ने से निर्दोशो को मारने से क्या किसी समस्या का समाधान हो जायेगा.अन्याय ओर शोशण कोन नही कर रहा हे .पर खुद के द्वारा किया गया अन्याय नजर नही आता. आतन्क्वादी अन्याय के खिलाफ़ नही लड रहे वो तो पुरी दुनिया को अपने हिसाब से बद्लना चाहते हे .ओसामा ने ये स्पस्ट कहा हे कि वो पुरी दुनिया मे खुदा क राज चाहता हे .बाकि जगह भी लोग शरीयत को लागु करने पर अड जाते हे . ये वही लोग हे जो हर जगह पाये जाते हे --फ़न्डांमे्न्ट्लीस्ट-या आमुल प्रमाणवादी .चाहे वो केथोलिक हो चाहे कट्टर यहुदी या हिन्दु धर्म को मुस्लिम धर्म की तरह मिलिटॆन्ट धर्म बना देने वाले समुह . अन्तर इतना हे कि हिन्सा को वेधता कही भी प्राप्त नही हे सिवाय मार्क्स्वादियो,फासीवादियो और सामी धर्मो के .इनके समर्थक जेहाद कि अवधारना कुरान मे पाये जाने का तो विरोध करते हे पर ये नही बताते कि कहा अन्य धर्मो के समान दया करुणा ओर परोपकार की बाते लिखी हुए हे . सम्स्या यही हे हिन्सा की वेधता ओर अन्तिम सत्य को जानने का दावा जो किसी भी तरह के तर्क वितर्क ओर बहस को अस्वीकार करता हे .सत्य हमेशा मानवीय द्र्श्टीकोन पर निर्भर करता हे .इसीलिये महावीर स्वामी को पेड -पोधो मे जीवन नही दिखाई दिया ओर उन्होने इसे शाकाहार माना . तब तक इन्मे जीवन प्रमाणित नही हुआ था.बुद्ध बीवी को त्यागकर सन्यासी हो गये और किसी ने उन पर बीवी बच्चो को बेसहारा करने का आरोप भी नहीं लगाया .ओर मुस्लिमो तथा इसाइयो को मान्साहार मे कुछ अन्याय नजर नही आता खुद पर अन्याय की दुहाई देते समय . जेसे निर्दोशो को मारने का लाइसेन्स इनके पास हे .जेसे अमेरीका के पास हे जापान मे परमाणु बम फ़ोडने का ओर इराक पर कब्जा जमा लेने का .अन्तिम सत्य को जानने का दावा करने वाला कोइ भी आदमी जाने या अन्जाने मे मानवता के प्रति अपराधी हे चाहे वो कोई भी हो . . अब आगे लिखते हुए मेरी भी फ़ट रही हे कही मुझे भी बम से उडा दे तो . सबसे सेफ़ तो गान्धीजी ओर महावीर स्वामी की आलोचना हे क्योकि ये अहिंसा को मानते हे और इनके अनुयायी अगर आलोचना करने पर हिंसक विरोध करते हे तो खुद ही गलत हे . पर सबकी भावनाये आहत होते देख उन्की भी भाव्नाये आहत हो सकती हे . हो सकता हे इनको लगे की हमारे साथ अन्याय हो रहा हे .अहिन्सा को कोइ मान हि नही रहा तो ये भी बम फ़ोड दे. तस्लीमा का हश्र तो देख ही रहे हे ना.दरअसल सही और गलत की पहचान करना इतना आसान नहीं हे. हर कोई गांधीजी की तरह नहीं हो सकता जिन्होंने अंग्रेजो का विरोध करते हुए भी जापान और जर्मनी जेसी फासीवादी ताकतों की सही पहचान करते हुए उनका सहयोग लेना गवारा नहीं समझा.कही ना कही कम या ज्यादा अर्थो में हम किसी न किसी रूप में कुछ गलत चीजो या अन्याय का हिस्सा होते हे और किसी न किसी रूप में पीड़ित भी होते हे. दूसरो को बदलना हमारे बस में नहीं हे पर जहा कही भी हम गलत चीजो का हिस्स्सा बनने से अपने आपको बचा सके,यही जरुरी हे.वो चाहे पुरुष के रूप में स्त्रियों के पर्ती यवहार हो, बड़ो के रूप में बच्चो के प्रति.बच्चो के रूप में बड़ो के प्रति, मालिक के रूप में नोकरो के प्रति चाहे जिस रूप में पर यही एक आसन तरीका हे जिसे बिना किसी को बदले खुद के प्रति थोडा सा अवेयर होते हुई पालन किया जा सकता हे और ईश्वर की बनायी हुई इस खुबसूरत दुनिया को और बेहतर बनाया जा सकता हे. ( ये एक साल भर पुरानी पोस्ट थी जिसे थोडा सा एडिट करके आज मेने वापस पोस्ट किया हे)
कुछ लोग रोते हुए आते हे दूसरो को रुलाते हे और रोते हुए ही चले जाते हे जबकि कुछ लोग रोते हुई आते हे और हसते हुए चले जाते हे जिनके जाने के बाद दुनिया रोती हे .
कुछ लोग रोते हुए आते हे दूसरो को भी रुलाते हे और रोते हुए ही चले जाते हे . कुछ लोग रोते हुए आते हे पर जिंदगी भर दूसरो को हसाते हे और हसते हुए ही चले जाते हे जिनके जाने के बाद दुनिया रोती.
समीक्षा धोबीघाट अच्छी मूवी हें या बुरी इस बारे मे निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता.पर मुख्या धारा के मनोरंजन प्रेमी दर्शको को ये निराश अवश्य करती हें. मूवी एक आर्ट मूवी की तरह शुरू होती हें.दर्शको की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करती हें और अंत मे उसे साहित्य की कल्पनापरक गलियों के अंत की तरह धुखांत- सुखांत के भवर मे डालकर समाप्त हो जाती हें.आमिर खान की छवि व्यावसायिक सिनेमा मे आर्ट एलिमेंट वाली मुविस की बनी हुई हें जो मनोरंजन करने के साथ साथ दिल को भी कही छुटी हें.ऐसे मनोरंजन और मूवी की अपेक्षा रखने वाले दर्शको को इससे निराशा ही हाथ लगेगी.खेर जो भी हें मूवी ठीक हें पर आर्ट की द्रष्टि से भी इसे कोई बहुत अच्छी मूवी नहीं कहा जा सकता.रेनकोट,लाइफ इन अ मेट्रो.जेसी मुविस के आस पास भी नहीं हें. कभी कभी लगता हें की मूवी मधुर भंडारकर की फिल्मो की तरह सत्य का शाक्षात्कार करते हुई चलती हें.कभी वृत्त चित्र के सामान लेकिन उस द्रष्टि से भी उतनी गहराई नहीं हें . एक द्रश्य जरुर अन्दर तक झकझोर देता हें. जब तीन विडिओ केसेट देखते हुए आमिर उसके तार्किक अंत की कल्पना करता हें तब नायक और मूवी की के द्रश्य मे पसरी हुई असहायता हमें अन्दर तक झकझोर देती हें. एक पल के लिए तो एसा लगता हें की नायक अब सब कुछ छोड़कर उस नायिका की जीवन सुधरने का बीड़ा उठा लेगा पर अगले ही पल फासी के द्रश्य की कल्पना मन को गहरे अवसाद गुस्से और असहायता के भवर मे ले जाती हें.फिल्म मे प्रतीक रूप से बेजान इमारतो या घरो से जुडी हुई लोगो की जिन्दगी को दिखाया गया हें.हर घर या इमारत के बदलने से जिन्दगी किस तरह से बदल जाती हे.बेजान पत्रों में भवनाओं का खाधा मिलने से ही वह घर बनता हे.जिसे छोड़कर जाना गहरे अलगाव को पैदा करता हे.हालाकि आमिर को भी अंत में घर बदलने के सिवा कुछ और नहीं सूझता.ये बात जरुर हे की आम फिल्मो की तरह निर्देशक ने तलक शुदा नायक के अवसादग्रस्त स्थिथि का कारण उसकी पत्नी को बताने से बचा गया हे जो काबिलेतारीफ हे .दूसरी और द्वंद मे पड़ी नायिका जो पेंटर को प्यार करती हें पर धोबी से मिल रहे भावनाओ के कोमल स्पर्श को भी नहीं छोड़ना चाहती.अंत मे उसके द्वरा पेंटर का पता देने और अपने दोस्त की हत्या से उपजे सच को स्वीकार कर नायिका के द्वंद को जानकार अपने मनोरम कल्पनाओं को विराम देने की कहानिया ह्र्दयास्पर्शी जरुर हें. पर त्री इडियट जेसी हास्य--उदेश्यपरक फिल्म की अपेक्षा लिए फिल्म देखने गए सामान्य दर्शको का इससे संतुष्ट हो पाना संभव नहीं हें . मजाक मे लोग ये भी कह रहे हें. संजय लीला भंसाली के बाद शायद आमिर मे आस्कर के मोह मे पड गए लगते हें . खेर जो भी हो ये धारणा तो टूट ही गयी हें की आमिर की मूवी हें तो अच्छी ही होगी.by राकेश जैन
हिंसा की पवित्रता -- हिंसा के प्रति अनुराग सभी समाजो मे पाया जाता हें लकिन कुछ समाजो मे ये जयादा पाया हें .खासकर के ESE समाजों मे सत्य की एक्वादी अवधारणा पायी जाती हें.इसीलिए हिंसा के पार्टी मोह एसा समाजो मे ज्यादा पाया जाता हें.चीजो को सिर्फ सही और गलत नजरिये से देखना ठीक नहीं हें . सही और गलत के आलावा और भी bahut से दर्श्तिकोना हो सकते हें.सत्य की एक्वादी अवधारणा मे एक तरह की एक्स्क्लुसिव्नेस आ जाती हें जो अपने आपको सही और दूसरो को गलत मानती हें. यह किसी भी धर्म संस्कर्ति विचारधारा मे हो सकता हें .सभी सामी धर्म (मुस्लिम,इसाई,यहूदी) मे तो यह अवधारणा पायी हि जाती हें . पहले मे यह समझता था की हिन्दू धर्म मे हिंसा का प्रावधान नहीं हें पर बाद मे मेने अमर्त्य सेन के जस्टिस मे महाभारत मे हिसा पर्तिहिंसा की प्रासंगिकता के बारे मे तर्क पढ़े तो गीता का मुख्या उपदेश यही लगा किहिंसा के बदले पर्तिहिंसा करना उचित हें. आधुनिकताकी अवधारणा ने भी यही किया की manushayaa ke sahi or galat me sochne ki parvarti ko or pukhataa kar diya . sampradaayikataa or धार्मिक संघर्षो पर अध्ययन करने वालो ने ये बताया हें की इस तरह की एक्स्क्लुसिव्नेस आधुनिकता के बाद हि धर्मो मे आई .हिंशा को उचित ठहराते समय हम अकसर अपने सही होने का तर्क देते हें और पर्तिहिंसा को उचित टहराते हें .
प्यार मे आदमी गुलाम हो जाता हें और शादी मे गुलाम बनाने की कोशिश करता हें.when people fall in love they become slave but when they get married with someone they treat their spouse like a slave .
नक्सलवाद केवल सामाजिक आर्थिक समस्या हि नहीं हें इसके अलावा भी नहुत कुछ हें.विचारधारा की भी इसमें प्रमुख भूमिका हें.मरी हुई विचारधाराए अभी भी की लोगो को सभी समस्याओं से मुक्त राम राज्य का सपना दिखाती हें जिनकी अप्रासिंगकता जगजाहिर हें.क्रान्ति की अव्यहार्यता व्यहार और सिदांत दोनों मे सिद्द हो चुकी हें.हामारे सारे सामाजिक -राजनितिक सिद्धांतो की सीमा मानव स्वभाव की कमजोरिया हें। इंसान अछाई और बुराई दोनों का मिश्रण हें । इसलिए इन्हें कम तो किया जा सकता हें पर मिटाया नहीं जा सकता.
Its a nice movie.comady romance n story is also there.i said good in the sence of time pass nothing else.some of my friends they dind like the movie y i dont know.
हिंदी ब्लॉगर समुदाय को ये सूचित करते हुए मुझे हार्दिक पर्संनता हो रही हे की इस वर्ष मेरा चयन आई ऐ एस परीक्षा में ४०५ वी रेंक पर हो गया हे । संभवत आई आर एस मिल जाएगा .आप सभी ब्लागर्स का ज्ञान संवर्धन और मुद्दों पर समझ के लिए आभारी हू.
मुझे आज तक समझा मे नहीं आया की भारतीय शिक्षा संस्थाओ और लोक सेवा आयोगों को परिक्षर्तियो को उनकी कापी की नक़ल देने मे क्या दिक्कत हें । कुछ पेसे लेकर नकल या ज़ेरोक्स देने से तो brshtaachar ही रुकेगा । एसा लगता हें जेसे उत्तर्पुस्तिकू की नक़ल दे देने से रास्त्र की एकता और अखंडता खतरे मे पद जाएगी .बहुत से लोग आतम हत्या या डिप्रेसन के शिकार हो जाते हें क्योकि वो कभी समझ ही नहीं पते की उनके घटिया नम्बरों का कारण क्या हें .सिब्बल साहब को इस पर भी जोर देना चाहिए। --एक बहुत अछे कोटेशन मे इसे खा जा सकता हें ---की भारत मे हमने पर्तिस्प्रधामुल्क समाज का मानक तो अपना लिया हें पर उनमे पर्दर्शन को मापने वाली संस्थाओ की गुणवत्ता बहुत ही घटिया हें .इसे एसा कहा जा सकता हें की दोद मे जीत का निर्णय करने वाले रेफरी की घडी ही १० मिनट आगे पीछे हें । जहा हार जीत सेकंडो सी तय होती हें .
Koi tumse puche kaun hun mein To kehdena koi khas nahin Ek dost hai kacha pakka sa Jajbaat pe dhare ek parda sa Dil ka aisa saathi hai Jo durr rehke paas bhi hai Koi tumse puche kaun hun mein To kehdena "KOI KHAS NAHIN
Once i asked on yahoo answers a interesting question what is life ?there are many reply but one is very precious . A Brazilian lady said - life is game of choice and decision .Many things are important in life like luck,god,parenting,conditions .People believe in these things .But i realise -- many factors n conditions controls our life . We believe in god n luck but no one know about the objectivity of such things. We just believe in these things because we can not know the reason behind the events . In this situation i also believe in this quote--LIFE IS GAME OF CHOICE AND DECISIONS
किसी ने सही कहा हे की एक साथ कई सारे काम नही कराने चाहिए। वरना किसी भी काम मे हम अपना पुरा समपर्ण नही दे पाते और काम बिगड़ जाते हे या उनमे एक प्रकार की कामचलाऊ पण आ जाता हे । .काफी दिन हो गए लिखे हुई सोचा कुछ तो लिखता हु.
आम तोर पर लोग जहा से सोचना बंद करते हें दर्शनशास्त्र मे लोग वहा से सोचना शुरू करते हें । अगर किसी को अपने ज्ञान पर कुछ ज्यादा ही घमंड हें और उसने दर्शन कभी पढ़ा नही तो ये जायज नही होगा । सुकरात ने कहा भी हें की जो अपने अज्ञान की सीमाओं को जानता हें वही ज्ञानी हें । यानि जो gayn की अज्ञानता को जानता हें.लादेन भी एक एन्ज्नीयर था .अधिकांश इसे लोग जो कट्टरवादी मान्यताओ से गर्स्त होते हें वो की बार उच्छ शिक्षित होते हें पर ,मानविकी मे नही बल्कि वैज्ञानिक विषयों मे । जिनमे निश्चित ज्ञान का दावा किया जाता हें । जबकि सामाजिक विषयों मे अध्ययन द्वंदात्मक होता हें .इसलिए इसे लोगो के कतार्पंथी बनने की संभावना कम होती हें.
कुछ विद्वान आतंकवाद को भी अन्याय से लड़ने की तकनीक मानते हे .मेरा मत हे की एसा कुछ ही मामलों मे सही हो सकता हे .जिन्हें पीड़ित रास्तीयाताये मानकर हिंसा को उचित ठहराया जा सकता हे। पर अल कायदा आतंकवाद -मुस्लिम विश्वव्यापी आतंकवाद को नही । क्योकि उनके पास किसी just सोसाइटी का विचार नही हे.वो तो अपनी कट्टर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर शरीयत जेसा देवीय शाषन चहाते हें। uसकी व्याख्या का अधिकार भी उनके पास ही हें .ख़ुद पर शासन करने के अन्य लोगो के अधिकार को भी वे नही मानते .उन्हें अपने अनेतिक कार्यो के लिए अमेरिका की भाति किसी wmd वेपन जेसे मुखोटे की भी जरुरत नही हें । स्पस्ट हें की आतंकवाद का यह रूप ही विश्वशांति के लिए खतरा हें न की अन्य स्थानीय पक्र्ती के आन्दोलन .और इसे किसी भी आधार पर justify नही किया जा सकता .इसे उचित ठहराना इसमे व अन्य जायज हिसात्मक आंदोलनों मे फर्क न कर पाने के कारण हें । मार्क्सवादी चश्मे से तो ख़ुद को मारने आया किक्लर भी सामाजिक परिस्थीथीका उत्पाद नजर आता हें .
आप तब तक नही हराते जब तक की आप सचमुच अपने आपको हारा हुआ नही मान लेते.दोड़ मे की बार पहले आने वाले और अन्तिम स्थान वाले धावक का पता होता हे फ़िर भी विजेता तब तक घोषित नही किया जा सकता जब तक की दोड़ पुरी न हो जाए । यानि कभी घुटने न टेके आप तब तक नही हारते जब तक आप सचमुच हार नही जाते .
सामाजिक न्याय के दो मनको मानको मे विरोध हो तो उस मानक को अपनाना चाहिए जिससे समाज का ज्यादा भला हो । आरक्षण देते समय उसका पड़ विशेष और कर्तव्यों की डरती से भी अवलोकन करना चाहिए । मान लीजिये विधवाओं और विकालान्गोकोआरक्षण देना सामाजिक न्याय के अनुरूप हे। यदि कही दसवी पढाने के लिए शिषको की भरती हो और विधवा उमीदवार की कट ऑफ़ बहुत नीचे जाए आरक्षण की वजः से १०० मे से २० पर ही चयन हो जाए । तो विधवा के साथ तो न्याय हो जाए गा पर उन बचू के साथ न्याय हुआ जिन्हें वो पधाएगी । क्या सरकारी स्कुल मे पढ़ने का मतलब आरक्षण प्राप्त जातीय टीचर से पढ़ना हुआ। इसमे उस पड़ विशेष पर कार्य करने वाले की सेवाओ का लाभउठाने वाले समूह का भी ध्यान रखना चाहिए। आपदा पर्बंधन मे यदि विलांगो को आरक्षण देकर नियुक्ति दी जाए तो क्या ये उचित होगा । इसका पुरे समज आर पड़ने वाले समग्र प्रभाव का भी आकलन करना चाहिए.इस समस्या का समाधान या हो सकता हे की आरक्षण देते समय न्यनतम मानक भी निशिचत करने चाहिए उनसे अधिक विचलन कोस्वीकार नही करना चाहिए .अन्यथा समग्र रूप मे ये सामाजिक अन्याय का एक उपकरण सिद्ध होगा।
राजस्थान मे आरक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ हे ।गुर्जरों का कहना हे की हमारी हालता मीणाओं की तुलना मे ख़राब हे । गुराजरो को दिया जाए या नही इस पर बहस चल रही हे । लेकिन जीके आदिवासी होने पर संदेह नही हे उनकी क्या हालत हे ---भील ,सांसी ,डामोर ,सहरिया । इन सची आदिवासियों का हिस्सा कोण खा गया हे । भूख से नारने की खबरे इन आदिवासियों मे से आती हे न की गुर्जर और मीणाओं से
आरक्षण वो भी सरकारी नोकारियो मे ,के मुद्दे पर एक बात स्पष्ट हे की कोई भी व्यक्ति ,विद्वान निष्पक्ष नही रह paataa हे । अगर वो savarna हे to virodha ही karegaa or dalita या ओ बी cee से हे to samrthan ही karegaa.पर एक बात samjh मे नही आती ये digvijaya singh , arjun singh .or vee पी singh मे esaa क्या हे की ये इसका samrthan ही करते हे । शायद पुराने raajvansho से होने के कारण raajniti खून मे ही पायी जाती हे or raajniti का pahalaa sidaanta भी की futa daalo or raaj करो ।
हर कोई अपना पक्ष सही बताकर हिंसा को उ चित ठहरता हे पर इसके शिकार ज्यादातर निर्दोष ही होते हे । लंबे समय तक शत्रुता चलाने के बाद यह याद नही रहता की पहली गलती किसने की । की बार पीढियों से लड़ रहे लोगो जेसे कबीलों मे ,को यह याद नही रहता की वो लड़ क्यो रहे हे । पहली गलती छोड़कर लादी का कारन भी याद नही होता । बस लड़ रहे हे .पिछले ५-७००० सालो आदमी लड़ ही तो रहा हे । एक दुसरे के ख़िलाफ़ कभी यक्तिगत तो कभी कबीले परिवार या रास्त्र के रूप मे । लड़ने से समस्या हल हो जाती तो कबकी हो गा ई होती .युवाओ मे हिंसा के पार्टी कुछ ज्यादा ही आकर्षण पाया जाता हे । तात्कालिक रूप से कभी कभी ये फायदा भी पहुचा सकती हे पर इसे एक निति के रूप मे अपनाने के गंभीर परिणाम हो सकते हे । स्याम के पार्टी हिंसा की संभावनाओं से हमें शा आशंकित रहना । डर कर जीन तो कोई अची जिंदगी नही हे .ves e bhi jo svayam ko
भारतीय मध्य वर्ग की बड़ी अजीब विडम्बना हे । जब बहु धुधाने जात एहे तो चाहते हे की इसी बहु मिले जो भुधापे मे चन से दो रोटी रख दे और दुत्कारे न । यानि संयुक्त परिवार के लिए ठीक हो और उन शर्तो को मानाने के लिए राजी हो । पर जब बेटी के लिए रिश्ता देखने जाते हे तो कोशिश यही करतेव हे की लड़का एसा मिले जिस पर माँ बाप और छोटे भाई बहनों का भर न हो । ये दोनों बातें एक साथ सही केसे हो सकती हो । .बहु धुन्द्ते समय सम्मने वाले पक्ष को ग़लत नही ठराया जा सकटा और बेटी ब्याहते समय अपने आपको । हे पर हकीकत हमारे समज की । सब वाही पर दूसरो मे खामी या गलतिया निकलते हे