6/10/2007

हमसफ़र

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नहीहोतासच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होताकोई सह लेता है कोई कह लेता है क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होताआज अपनो ने ही सीखा दिया हमेयहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होताक्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे होइसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होताकोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना करख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता!!! कापी पेस्ट करने मे पूर्णविराम ग़ायब हो गया हे .सो शमा करे .

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