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6/10/2007
मे मर जाउंगा ?(मे खुद नही किसी ओर कि कहानी हे )
कुछ दिनों पहले नेट पर एक लड़के से बात हुई .उसकी उमर १९ साल ओर उसकी प्रेमिका कि उमर १७-१८ .वो कह रह अथ अकी वो उसे सच्चा प्यार करता हे ओर वो भी उसे .मेने कहा मन लो २-४ साल मे उसका या तुम्हारा मन बदल जाये या किसी को कोई ओर पसंद आ जाये तो ? क्योकि उसके अनुसार उसकी प्रेमिका डॉक्टर बन्ने के लिए पढाई करेगी । मेने कहा एसे मे ये संभव हे कि कोई ओर उसके नजदीक आ जाये या एसा तुम्हारे साथ ही हो जाये । उसने कहा कि अगर उसने कभी बेवफाई कि तो वो आत्महत्या कर लेगा .उसके हिसाब से सच्चे प्यारका यही मतलब हे .मेने कह आ यार जब तुम उसे ओर वो तुम्हे sachhapyar करती हे तो तो तुम्हारे दिमाग मे ये ख़्याल hi kese aaya ki usne dhokhaa diya to? इसका मतलब अभी विस्वास इस हद तक विक्सित नही हुआ । वरना तुम ये कहते कि वो मुझे कभी नही दूर करेगी .वो मेरे बिना जी नही पायेगी .तो थिक हे लेकिन अक ओर तो तुम शक कर रहे हो .दुसरी ओर अभी से निर्णय कर लिया कि आक्त्म्हात्या कर लूंगा । ये प्राकृतिक नही हे.ह प्यार मे जब दिल टूटता हे तो एसे लोगो कि जीन एकी इच्छा ख़त्म हो जती हे .पर पहले से ही एसा निर्णय करना गम्भीर मनोवेग्यानिक समस्या हे .शित्य्कारो फिल्म्वालो को प्यार को गर्वंवी करते समय भी ये ध्यान रखना कहिये । अधिकांश पेर्मी जोडे भी प्यार कि उस पराकाष्ठा तन से गुजर कर आत्म के मिलन तक नही पहुच पाते .ज्यादातर मामलो मे ये सिर्फ एक अची दोस्ती साबित होती हे .पर प्यार का ग्लेमर इतना हे कि हर कोई अपन एआप्को इसमे इन्वाल्व दिखाता हे भले ही वो विकल्पो कि कमी या योंन आकर्षण का ही केजुअल संबंध हो .पर उसे सच्चे प्यार के रुप मे दिखाना ओर उसके लिए मरने मिटने कि भावना रखना गलत हे । ये भाव्नाये .गहन प्यार का अनुभव होने ओर उसके टूट जाने के बाद हो तो कोई बुराई नही लेकिन पहले से ही एसा सोचना अपरिपक्वता हे .अम्नोवेज्ञ्निक भी आईएस बात को स्वीकार रहे हे कि प्यार समाज मे अक बड़ी बुरी बनकर उभर रहा हे इसकी वजह से लोग अपनी थिक ठाक जिन्दगी को छोड़कर अनजानी रहो पर चल रहे हे नतीजा परिवारी विघटन .तलाक । बचू के अलगाव व अकेलेपन के रुप मे निकल रहा हे .मेने उसे लाख समझाया कि अभी आराम से जिन्दगी जीओ .प्यार क आनद लो ज्यादा मत सोचो ना ही दरो .जिन्दगी भर साथ रहने का इरादा एच तो उमर होते होई शादी कर लो .अक्सर लडकिया .तीन AGE मे हुई प्यार को बाद मे अच्छी करियर कि वजह सेठुकारा देती हे । मुझे आज भी उस लडके के शब्द अच्च्ची तरह याद हे ---कि अगर उसने बेवफाई कि तो मे मर जाउंगा .क्योकि सच्चे प्यार का यही मतलब हे .??क्यासछा प्यार हो ना हो लेकिन दुनिय अको दिखने के लिए ही कि मे सच्चा प्यार कर्ता था --आत्महत्या मनोवाग्यानिक बीमारी नही हे प्यार को गोरावान्वित करना तो थिक हे लेकिन प्यार के विभिन पक्षो ओर जीवन मे फली सछईयो को बहार लं आना क्या साहित्यकारो फिल्म्कारो का दायित्व नही हे --मधुर भंडारकर कि तरह ,.अगर उस लाद्क एने कभी आत्महत्या कि तो उसकी वजह प्यार नही होगा बल्कि उसकी प्यार के बारे मे एसी समझ होगी जो उसे खुदबनने पर मजबूर कर देगी । जिन्दगी मे अगर वो आगे बढ पाय तो नही मरेगा ओर नही बढ पाया तो अपनी साड़ी अस्फल्ताऊ से उत्पन्न निरर्थकता बोध को किनारे रखकर प्यार मे दिल टूटने को इसकी वजह मने गा ओर मर्त्यु का वर्ण करेगा .हना सच्चा प्यार ?आत्महत्या ओर समझा का फर्का .अगर कोई आत्महत्या ना करे तो इसका मतलब हे कि वो सच्चा प्यार नही नही कर्ता। आये दिन लड़को द्वारा खुद को आग लगाने या अक्प्क्शिया प्यार मे मरने कि खबरे आती रहती हे .जाहिर हे प्यार का यथार्थवादी दर्श्ती से विश्लेषण का आभाव हे ..अगर आपको भी कोई लड़का या लडकी से प्यार हो जाये ओर बाद मे संबंध टूट ज्ये तो आप भी आईएस एसछा प्यार का नाम देकर मर्त्यु के बाद भी पर्सिधा हो सकते हे .कितना नीच हे आदमी आत्महत्या मे भी आएदेंतिती दून्धता हे .जीती जी ना शै मरने के बाद ही पर्सिध हो जाये.मेरी समझ मे तो जिन्दगी से बड़ी कोपी चीज नही । सछ एप्यार के नाम पर आत्न्ह्त्या का विचार रखना खुद के प्रति बेईमानी हे ओर खुच नही ।
2/27/2007
प्यार-शादी-विग्यापन----गिरते मानवीय मुल्य.
शादी का रास्टीय समारोह------ अभीसेक ओर एश की ----प्यार कि आधुनिक परीभासा .स्त्री सफ़लता डूण्ड्ती हे जबकी पुरुश सुन्दरता .एश ओर अभि के प्यार कि शुरुआत रीफ़्युजी फ़िल्म से हुई .हा हा बीच मे अभि सफ़ल नहि हुआ . एश एक आम ज्यादा समझदार लड्की की तरह प्यार भी करना चाहती थी ओर शादी भी, साथ ही पति सीधा-साधा ओर सफ़लता साथ मे हो तो बल्ले बल्ले . अभि नही चला तो सल्मान से शुरु फ़िर लगा कि ये तो मुझे बान्ध लेगा ओर आगे इसकी सफ़लता कि समभावनाये कम हे तो दुसरे से चिपको .दम हुई हीट साथ मे अपने विवेक भाई थोडे नेकदील भी हे ,आगे हो सकता हे सुपर स्टार बन जाये - तो उनसे प्यार शुरु . हा हा .सल्लु नाराज तो विवेक से बोले दात तोड दुन्गा. विवेक बेचारा शायद जानता नही था कि कुछ लोगो के लिये इन्सानी रिश्ते भी नफ़ा--नुक्सान से ज्यादा नही होते . वो शायद भुल गया था कि शोशन ओर मुनाफ़ जिस दुनिया काउसुल हे वहा भावनाओ कि फ़िक्र कोन करता हे.फ़िर विवेक फ़्लाप तो प्यार भी खत्म . ह ह गुड ना .अब अभि सहब धीरे धीरे सफ़ल तो प्यार शुरु .फ़िर शादी. जबर्दस्ती हाइप ताकि दोनो कि जोडी वाली फ़िल्मे सफ़ल हो . मीडीया मे बच्चन परिवार के मित्रो की कमी थोडी हे.वेसे भी आजकल खब्रे कम विग्यापन ज्यादा होते हे .च्युन्गम के उपर भूत शोध हो रहे हे कि इसे चबाने से स्म्रति बड्ती हे.कसरत करने से आदमी दिमाग से पेदल हो जाता हे .ताकि चुयुन्गम ज्यादा बिके . आज बजार वस्तुओ का नही छ्वी का विकरय करता हे.इसी तरह इन्सानी रिश्तो ओर नितानत निजी चीजो को भी उचला जाता हे ताकि बिना पेसे दिये ही चटपटी खबर के रूप मे जोडी पर्सिध हो जाये.यह आमिताभ सहब के वेयक्त्तव का पतन ही हे .घाटे से उब्ररने के लिये जिस तरह अमर सिन्ह जेसे लोगो के हाथो ब्लेक्मेल हो रहे हे .कुछ दिन पहले गुरु मे आभिशेक कि भुमिका के लिये उन्होने धर्तरास्त्र्ट कि तरह कहा कि अभिशेक ने अमिताभ को हरा दिया हे .अमिताभ ओर लता जी अतुल्नीय वयेक्तित्व हे.खेर शायद साल दो साल मे इस कहनी का अन्त भी मुझे ही लिख्नना पडेगा . अभि पर दया आ रहि हे .ओर एश कि सोच पर भि .........दोड जिन्द्ग्गी की तु भी दोड मे भी दो्ड रहा ह .बेचारा अभि ओर उनके पिता श्री अमिताभ जो अमर सिन्ग के अह्सानो तले दबे हे .कभी ये खबर भी उडी थी कि अमर सिन्ह एश से किस् चाहते थे . बकवास करते हे लोग .अमर सिन्घ जि तो अब उन्के ससुर के समान हे .ये मत समझईये कि मुझे महिलाओ पर सिर्फ़ कीचड उछालना आता हे . या मे उन्की सुन्दरता से जल्ता हु . या मे गलि के अवारा लडके कि तरह खुद से लदकी नही पटने पर उसे चालु घोशित कर रहा हु.ना हि मे आफ़िस के किसि पुरुस करमचारी कि तरह हु जो हर महिला करमचारी कि प्रोन्नति पर उस्के नाजायज सम्बन्धो कि अफ़्वाह उछाल देता हे .मुझे तो बस इतनी शिकायत हे कि अगर इसे सच्चे प्यार कि तरह बत्लाते हे.टीक वेसे हि जेसे आमिर खन ने घर से भगाकर शादी करने के १८ साल बाद अपनी बीवी को छोड दिया .बेचारी ने कभी अपने केरीयर के बारे मे नहि सोचा .अब उसे जिन्दगी भर इस पह्चान के साथ जीना पडेगा.शायद वो कभी आत्महत्या ही कर ले.एसे आदमी की पीडा की को आसानी से मह्सुस नहि किया जा सकता .सफ़ल लोगो को ज्यादा प्यार होता हे. १८ साल मे आमिर कि बिवि को किसि से प्यार क्यो नही हुआ .शायद इस्लिये कि उसे इस्का अन्जाम पता था . अगर उन्हे किसि से प्यार हो जाता तो क्या आमिर उसे इत्नी आसानी से छोड देते.मीडीया तब उन्के प्यार को लेकर बहस नही करता.खेर यक्तिगत स्वतन्त्रता का तो मे भी घोर समर्थक हु.किसि कि पर्सनल लाइफ़ पर टीका टीप्पणी भी मुझे पसन्द नहि हे .क्योकि एसे मामलो मे सच्चाई सिर्फ़ यक्तिगत ही होति हे .पर इसी तर्क के बहाने तो पुरुश केनिद्र्त समाज महीलाओ पर अत्याचार करता आ रहा हे .ये हमारा घरेलु मामला हे तुम कोन होते हो दखल देने वाले?पर जहा अन्याय हो उस पर चुप रहना कायरता हे . इसीलिये तो नारीवादी चिन्तको को आवाज लगानी पडी पर्सनल इज पोलिटीकल .अर्थात पारिवारिक या यक्तीगत जीवन से जुडे मसले सर्वजनिक वाद -विवाद का विसय हे.राज्य नागरिको के हित मे इन पर कानुन बना सकता हे.क्योकि ये मसले पहीलओ के पर्ती भेदभाव पुर्ण हे. सेलिब्र्टज की खिचाइ इस्लिये क्योकि इन्हे मुफ़त मे अप्ने उल जुलुल कारनामो के लिये पर्सिधी मिल्ती हे तथा सामान्य जनता विशेसकर युवा वर्ग इन्हे अपना रोल माडल मानता हे.तो फ़िर इन्की आलोचना क्यो नहि.अब अगर भारत की हर लडकी एश्वर्या जेसी सोच कि हो जाये तो मुझे जिन्दगी अकेले हि काटनी पदेगी.नाना पाटेकर कि तरह .प्यार मे धोखा खाये लोग कभी विस्वास नही कर पाते कि कोइ उन्से सच्चा प्यार भि कर सकता हे?वेसे मुझे तो दर्द तब होता हे जब लोग इसे प्यार कह्ते हे .वरना क्या काजोल--अजय,जावेद--शबाना जी जेसी जोडीया भी तो हे . प्यार मे कमिटमेन्ट ना हो तो वो केसे अवसर्वादिता मे बदल जाता हे .एश्वर्या के तेजी से बद्लते सम्बन्ध ओर अभि से विवाह ओर विवाह क सस्पेन्स क्रीयेट कर फ़ेमस होना ओर उस फ़ेमेसिटी का अप्नी रीलिज होने वालि फ़िल्मो कि तारीखो से ताल्मेल बेटाना .गिरते मान्वीय मुल्यो कि कहानी हे .अवसरवादिता का उदाहरण हे ना कि कि किसि सच्चे प्रेमी युगल के विवाह का जिस पर सब लोग खुश हो.केसा ये प्यार हे ?जमाना बदल गया हे दोस्त अब तुम भी बदल जाओ.नही मे नही बदलुन्गा.तो फ़िर तेयार रहो--दिल उसी का टुटता हे जिसका कसूर नही होता.प्यार की नयी परिभाशा .स्त्री सफ़लता डून्ड्ती हे --पुरुस सुन्दरता .वेसे मुझे लगता हे .आजकल लड्के ज्यादा इमोशनल होते हे .लड्कीया ज्यादा स्मझदार होती हे .एश्वर्या के तेजी से बद्लते प्रेमी इसका सटीक उदाहरण हे. प्रेमचन्द ने सटीक लिखा हे .---पुरुस मे स्त्री के गुण आ जाये तो पुरुस सन्त बन जाता हे ओर स्त्री मे अगर पुरुस के गुण आ जाये तो स्त्री कु्ल्टा बन जाती हे .वेसे मे कुलटा ..जेसी धारणाओ का सखत विरोधी हु.क्योक ये एकतरफ़ा महिलाओ के लिये ही हे पुरुसो के लिये एसे कोइ शब्द ही नहि हे .अब तो खेर योन व्यवहार नेतिकता का अन्श हे यह भी विवादास्पद हे .लेकिन फ़िर भी ओशो जेसे क्रान्तिका्री विचारक ने यह बात मानी हे कि नारीवा द महीलाओ को पुरुश बना देना चाहता हे .इस्से दोनो के बीच का आकर्श्ण व परेम का माधुर्य कम हो जाता हे .खेर बाकि आप पर.......
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